Sirmaur Shri Renuka seat, Congress has been winning for 40 years | 40 सालों से हिमाचल की इस सीट पर कांग्रेस का है दबदबा, क्या बीजेपी कर पाएगी उलटफेर?

कांग्रेस के टिकट पर प्रेम सिंह 1982 में अपना पहला चुनाव जीते, फिर 1985 में दोबारा जीते. इसके बाद वह 1993, 1998, 2003 और 2007 चुनाव में भी विजयी रहे. हालांकि, इस बार बीजेपी ने इस सीट पर पूरी ताकत झोंक दी है.

40 सालों से हिमाचल की इस सीट पर कांग्रेस का है दबदबा, क्या बीजेपी कर पाएगी उलटफेर?

हिमाचल विधानसभा चुनाव

हिमाचल प्रदेश के सिरमौर में श्री रेणुका जी एकमात्र ऐसी सीट है. जहां पिछले 40 सालों से कांग्रेस का दबदबा बना हुआ है. केवल दो बार ही ऐसा हुआ है, जब किसी अन्य दल के प्रत्याशी यहां से जीते हैं. यह सीट 1982 से अब तक लगातार कांग्रेस के कब्जे में रही है. जिला सिरमौर के पांच सीटों में से इस सीट पर अनुसूचित जाति की संख्या 40 फीसदी के आसपास है. भाजपा ने इस सीट पर हाटी समुदाय से जुड़े मुद्दों को प्राथमिकता से उठाया है और हाटी समुदाय को अपनी ओर लामबंद करने की कोशिश की है. हालांकि, फिर भी कांग्रेस यहां पर मजबूत ही दिखाई दे रही है.

साल 1982 से लेकर 2007 तक इस सीट से कांग्रेस के डॉ प्रेम सिंह, 1990 चुनाव को छोड़ कर लगातर विधायक रहे हैं. उन्हें 1990 में जनता दल के रूप सिंह ने केवल एक बार हराया था. तब कांग्रेस के खिलाफ देश भर में लहर चल रही थी. लेकिन 1990 में बनी तत्कालीन भाजपा सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई . प्रेम सिंह 1982 में अपना पहला चुनाव जीते, फिर 1985 में दोबारा जीते. इसके बाद वह 1993, 1998, 2003 और 2007 में भी विधायक चुन लिए गए. लेकिन, 2011 में उनकी मौत हो गई व भाजपा ने तब हिमाचल प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हिरदा राम को पार्टी का टिकट दे दिया. तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल व उनकी टीम ने यह सीट कांग्रेस से छीनने में कामयाबी हासिल कर ली. यह बड़ा उलटफेर था.

प्रेम सिंह को वीरभद्र सिंह का प्राप्त था समर्थन

कांग्रेस विधायक प्रेम सिंह 1982 को पूर्व मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह का समर्थन प्राप्त था. ऐसा कहा जाता है कि प्रेम कुमार उन्हीं की बदौलत टिकट भी लेते और जीत भी हासिल करते. जिला शिमला के अलावा जिला सिरमौर ही दूसरा जिला था, जहां पर वीरभद्र सिंह की पूरी पकड़ थी. यही वजह रही कि एक ही परिवार सालों साल तक जीतता रहा और भाजपा व अन्य दल कांग्रेस की जीत के इस सिलसिले को रोक नहीं पाते थे.

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पिता के बाद पुत्र ने संभाली विरासत

2011 में प्रेम सिंह की मौत के बाद हुए उपचुनाव में बेशक साल भर से ज्यादा समय के लिए इस सीट पर भाजपा का कब्जा रहा. लेकिन, 2012 में उनके पुत्र विनय कुमार ने इस सीट को दोबारा से कांग्रेस की झोली में डाल दिया. यहां पर भाजपा का परिवारवाद का नारा 2017 में बेअसर रहा और विनय कुमार ने यह सीट 2017 में भी जीत ली. इस बार यहां कड़ा मुकाबला है. भाजपा ने उनके ही रिश्तेदार नारायण सिंह को पार्टी से टिकट दे रखा है.

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