Satire on entry denied on jama mosque of delhi au538 | …तो मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठ कर किसी का इंतज़ार करना भी मुनासिब नहीं

जामा मस्जिद में लड़कों और लड़कियों के आने पर मनाही कर दी गई.. कहा गया कि मामला बढ़ने पर कहा गया कि फैसला वापस ले रहे हैं पर मस्जिद फूल लेकर मिलने की जगह नही है..हालांकि ऐसा नहीं है कि लोग मुहब्बत के लिए आते हैं जामा मस्जिद…सच तो ये है कि मुहब्बत करने वाले ही इबादत करने आते हैं.

...तो मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठ कर किसी का इंतज़ार करना भी मुनासिब नहीं

जामा मस्जिद दिल्ली

हमारे जमाने में तो मस्ती में गाते थे- चांद चुरा कर लाया हू, चल बैठें चर्च के पीछे…अब तो मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठ कर किसी का इंतज़ार करना भी मुनासिब नही, लड़कियों के वास्ते.. सच्चा इश्क तो खुदा का दर पर ही मिल सकता है. लिहाज़ा इश्क की सच्चाई परखने के लिए भी तो मस्जिद ही आसरा है.. आखिर मान गए शाही ईमाम साहेब, शुक्र है खुदा का लाख-लाख.. अव्वल तो सच्चा इश्क मिलता नहीं, मिलता है तो उसका दीन-ईमान हमेशा शक के दायरे में रहता है… ऐसे में रिश्तों की परख तो खुदा को हाज़िर-नाजिर मान कर ही हो सकती है…लेकिन औरतों पर पाबंदी लगाने की शरारत ईमाम साहेब समझ गए. इस मौके पर उन्हें मुद्दतों पहले मर गया गालिब याद आया होगा. यूं होता तो क्या होता, वो भी यही कहता कि मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठ कर सेल्फी लेने दे वाइज़, या वो जगह बता जहां खुदा ना हो…

दरसल सारी पाबंदियां औरतो पर ही लागू की जाती है. पाबंदियां औरत पर सजती है. मर्दों पर तो आजादी फबती है. अब भी ईमाम साहेब ये भी कह रहे हैं कि वो मस्जिद आने वाली लड़कियों के इरादों की पड़ताल करेंगे. काश खुदा ने उन्हें ये इल्म बक्शा होता. तो दुनिया में हर मुसलमान सच्चा मुसलमान होता. हालांकि उन्होनें भरोसा दिया है कि नीयत भांपने में औरत-मर्द का भेद ना माना जाएगा.. जो मुहब्बत करे, उसी को अल्लाह का बंदा जाना जाएगा. ऐसा नहीं है कि लोग मुहब्बत के लिए आते हैं जामा मस्जिद…सच तो ये है कि मुहब्बत करने वाले ही इबादत करने आते हैं. क्योंकि मुहब्ब्त ही सच्ची इबादत है. मुहब्बत करने वाला ही इबादत के काबिल होता है. कहते हैं कि इश्क ए मजाज़ी से ही इश्क ए हकीकी हासिल होता है.. जो इंसान से मोहब्बत नहीं करना जानता, वो अल्लाह को क्या समझेगा.. जो गायब भी है, हाजिर भी. खुदा तक पहुंचने का जरिया यही है, जो अनलहक है, जो मुझमें है और तुझमें है.हम सब में है.

खु़दा ने औरत बनाया, अब इतनी दुश्वारियां क्यों

माफ कीजिएगा, ये मजहबी बहस नही है… फालतू अक्ल मुझ में नहीं है…लेकिन एक मौजूं सा सवाल है मेरे आलिम, खुदा ने कायनात चलाने के लिए औरत को बनाया, पीर पैगंबर ने उसे इज्जत देना और मोहब्बत करना सिखाया. फिर भी उसके वास्ते इतनी दुश्वारियां क्यों.. ये पाबंदियां तो उन शोहदों पर लगाई जानी चाहिए, जो वहां बिना वजह फिरा करते हैं, रील बनाते हैं और लड़कियों पर बुरी नज़र रखा करते हैं दरसल बुराई नज़रों मे होती है, वरना हर औरत में एक बेटी, एक बहन और एक मां होती है. उसे भी एक अब्बू, एक भाई और एक दोस्त की ज़रूरत होती है.
लड़कों की तरह उसके भी अरमान होते हैं. पाबंदियों में जीने वाली अगर खुदा की बंदगी के वास्ते मस्जिद आए तो कोई उज्र नहीं. लेकिन अगर उसे किसी का इंतज़ार करे तो मुश्किल है. और मस्जिद में इंतज़ार दुश्वार है. सिर्फ लड़कियों के लिए.. जामा मस्जिद की इंतजामिया कमेटी को यही तो ऐतराज है कि कोई यहां किसी का इंतज़ार करे, और उसके मिलने पर गुलाब देकर अपनेपन का इज़हार करे..इनका कहना है कि बॉयफ्रेंड से मिलना और उनके साथ टिकटॉक बनाना मस्जिद के लिए सही नहीं. इनकी नज़रों में गुलाब देना भी हराम है..

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अब बिचारी लड़कियां जाएं तो कहां जाएं

खैर..अब ना तो जी भर के देख पाएंगी, ना ही बात ही हो पाएगी, आरजू रह जाएगी मुलाकात की. बिचारी लड़कियां जाएं तो जाएं कहां.. मॉल और पार्क में बैठे तो भी नाक-भौं सिकोड़ी जाती है, हिकारत से देख कर पहचान ली जाती हैं.. सोचो ज़रा जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर बैठ कर जो बातें होंगी, वो कितना सूफियाना होंगी.. दीन का दीन रहे, हाथ से जन्नत ना गई.. फिर भी कोहराम मचा है. मचा उन्होंने रखा है जिन्हें कभी मुहब्बत ना हुई, उन्हें कौन समझाए. ये इश्क होता तो दिल के अंदर है, लेकिन इनको नज़र आ जाए. जानें क्यूं इन्हें मुहब्बत से खासी अदावत है..कोई इन्हें बताए इश्क होता ही सूफियाना है…यही इबादत है, यही कलमा है और अब इसी में फना हो जाना है..इनका अल्ला भी वही है, तो मेरा भी खुदा वही है, इबादत के तरीके भले अलग हों, लेकिन मंजिल तो जुदा नहीं है. और सच तो ये है कि कभी बंद हो ही नहीं सकते.. मस्जिद के दरवाज़े… मोहब्बत के वास्ते.

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