MRF Tyres Company Success Story From selling Balloons on the streets to becoming a Tyre Giant | बच्चों के गुब्बारे से लेकर सबसे बड़ी गाड़ियों के टायर तक… ऐसा रहा ब्रांड MRF का सफर

1946 में मैम्मेन ने रबर का व्यापार शुरू किया. उस वक्त मैम्मेन महज 24 साल के थे. तब वह एक कमरे में बच्चों के खिलौने भी बनाया करते थे.

बच्चों के गुब्बारे से लेकर सबसे बड़ी गाड़ियों के टायर तक... ऐसा रहा ब्रांड MRF का सफर

MRF कैसे बना टायर इंडस्‍ट्री का ब्रांड?

एमआरएफ कंपनी का नाम तो आपने सुना ही होगा! आपने इस कंपनी के टायर देखे होंगे! सचिन को MRF का स्टीकर सटे बल्ले से बैटिंग करते हुए तो देखा ही होगा! लेकिन क्या आप MRF का फुल फॉर्म जानते हैं? ज्यादातर लोग नहीं जानते होंगे! MRF का पूरा नाम है- मद्रास रबर फैक्ट्री. आज टायर उद्योग में इसका बड़ा नाम है. एमआरएफ का स्लोगन है मसल्स वाले टायर्स. साइकिल से लेकर ट्रक और अन्य बड़े से बड़े वाहनों तक में इस कंपनी के टायर लगे दिख सकते हैं.

देश की सबसे बड़ी टायर कंपनियों में शामिल एमआरएफ के मालिक केएम मैम्मेन मप्पिल्लई ने लगन और मेहनत के दम पर कंपनी को इंंडस्ट्री में स्थापित किया. एक समय था जब इस कंपनी को शुरू करने वाले मप्पिल्लई सड़कों पर बैग में गुब्बारे बेचते थे. 1967 में यह कंपनी यूएसए को टायर निर्यात करने वाली भारत की पहली कंपनी बन गई थी.

आज यह टायर उद्योग में बड़ा नाम है. एमआरएफ कंपनी में टायर्स के अलावा भी कई प्रोडक्ट्स बनाए जाते हैं जैसे ट्रेड्स, ट्यूब्स, पेंट्स, बेल्ट्स और टॉयज. तो आइए आज की ब्रांड स्टोरी में जानते हैं MRF की कामयाबी की पूरी कहानी.

6 साल तक बेचे गुब्बारे

केएम मैम्मेन मप्पिल्लई का जन्म केरल में एक सीरियाई ईसाई परिवार में हुआ था. उनके 8 भाई-बहन थे. मैम्मेन के पिता स्वतंत्रता सेनानी थे. एक स्वतंत्रता संग्राम के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. मैम्मेन उस वक्त स्नातक की पढ़ाई कर रहे थें. पिता के जेल में होने की वजह से घर की सारी जिम्मेदारी उनपर आ गई. इसके बाद वह सड़कों पर गुब्बारे बेचने का काम करने लगे. करीब 6 साल तक बैलून का कारोबार करने के बाद उन्होंने रबर का व्यापार शुरू करने का निर्णय लिया.

फिर शुरू किया रबर का बिजनेस

1946 में मैम्मेन ने रबर का व्यापार शुरू किया. उस वक्त मैम्मेन महज 24 साल के थे. तब वह एक कमरे में बच्चों के खिलौने भी बनाया करते थे. फिर उन्होंने चीता स्ट्रीट मद्रास में अपना पहला ऑफिस खोला. धीरे-धीरे मैम्मेन ने रबड़ के उत्पाद बेचने शुरू किए. साल 1956 के आते-आते उनकी कंपनी रबड़ के कारोबार में एक बड़ा नाम बन चुकी थी. रबर उत्पादों के बाद उन्होंने टायर उद्योग में हाथ आजमाया. वर्ष 1960 में उन्होंने रबर और टायरों की एक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनाई.

टायर बनाने के लिए अमेरिकी कंपनी से डील

प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनाने के बाद मपमप्पिलई ने मैन्सफील्ड टायर एंड रबर कंपनी ऑफ अमेरिका के साथ टायर बनाने के लिए एक समझौता किया. इस तरह से 1967 में एमआरएफ अमेरिका को निर्यात करने वाली पहली कंपनी बनी. कंपनी की अगली बड़ी उपलब्धि रही कि इसने 1973 में देश में पहला नायलॉन टायर लॉन्च किया. 1979 तक कंपनी का नाम विदेशों में फैल चुका था, लेकिन उसी साल अमेरिकी कंपनी मैन्सफील्ड ने एमआरएफ में अपनी हिस्सेदारी बेच दी. इसके बाद कंपनी का नाम एमआरएफ लिमिटेड हो गया.

टायर उद्योग में नंबर वन पोजीशन

इसके बाद मप्पिल्लई ने कई बड़ी और छोटी कंपनियों के साथ गठजोड़ कर कंपनी को एक नए स्तर पर पहुंचाया. लेकिन अफसोस कि साल 2003 में 80 साल की उम्र में मप्पिल्लई का निधन हो गया. हालांकि तब तक मपिल्लई कंपनी को टायर सेक्टर में नंबर वन बना चुके थे. मपिल्लई की मृत्यु के बाद, उनके पुत्रों ने व्यवसाय संभाला और कंपनी का विकास जारी रहा.

गाड़े कामयाबी के झंडे

MRF ने मोटरस्पोर्ट में बहुत निवेश किया. जैसे MRF रेसिंग फॉर्मूला 1 और फॉर्मूला कार, फॉर्मूला मारुति फेसिंग, MRF चैलेंज, MRF रैली टीम, MRF मोटोक्रॉस, MRF कार्टिंग और क्रिकेट. भारत की सबसे ज्यादा बिकने वाली कार मारुति 800 में भी एमआरएफ के टायरों का इस्तेमाल होता था. इसके अधिकांश निर्माण इकाइयां केरल, पुडुचेरी, गोवा, चेन्नई और तमिलनाडु में स्थित है. इसके शेयर की कीमत भारत में सबसे ज्यादा है. यह मैम्मेन की हिम्मत और उनके बेटों की काबिलियत है कि आज एमआरएफ 34 हजार करोड़ की कंपनी बन गई है.

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