India is learning to live with Covid while China is finding it difficult to move out of the zero Covid policy | भारत कोविड के साथ जीना सीख रहा है जबकि चीन के लिए जीरो-कोविड पॉलिसी से बाहर निकलना मुश्किल हो रहा है

चीन की जीरो-कोविड पॉलिसी, हालांकि इसने चीन में कोविड को रोकने में मदद की, यह सुनिश्चित किया कि चीन में मौतों की संख्या अपेक्षाकृत कम हो, लेकिन इसने वहां बहुत असंतोष पैदा किया है.

भारत कोविड के साथ जीना सीख रहा है जबकि चीन के लिए जीरो-कोविड पॉलिसी से बाहर निकलना मुश्किल हो रहा है

डॉ अशोक के कांता

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पिछले साल जब भारत में कोविड के मामलों और मौतों की संख्या काफी बढ़ गई थी, एक बहुत ही दुखद टेप या वीडियो सामने आया था जिसे चीन की कम्युनिस्ट पार्टी और उनकी कानून प्रवर्तन एजेंसी से जुड़े सिना वीबो अकाउंट पर पोस्ट किया गया था जो तियान्हे अंतरिक्ष मॉड्यूल की लॉन्चिंग और भारत में बड़े पैमाने पर खुली हवा में होते दाह संस्कार को इस सवाल के साथ दिखाता है कि चीन आग लगाता है और भारत आग जलाता है और यह है दोनों के बीच का अंतर.

यह बहुत ही असंवेदनशील था जिसकी कड़ी आलोचना हुई थी और इस वजह से चीन ने इसे वेबसाइट से हटा लिया था. लेकिन यह चीन की उस मानसिकता को दर्शाता है कि वे कोविड को नियंत्रित करने में सफल रहे हैं जबकि भारत और अन्य देश विफल.

‘भारत में कोरोना से पांच लाख से अधिक लोगों की जान जा चुकी है’

उस समय यह सच है कि भारत और अमेरिका में मामलों की संख्या खास तौर से डेल्टा लहर के दौरान काफी बढ़ गई थी. हम जानते हैं कि भारत में कोविड के कारण पांच लाख से अधिक लोगों की जान जा चुकी है. वहीं अमेरिका में इससे होने वाली मौतों की संख्या 10 लाख से ज्यादा है, जबकि चीन में कोविड के कारण होने वाली मौतों की आधिकारिक संख्या महज 5000 से ज्यादा है.

वे अपने देश से शुरू हुई इस महामारी को इस हद तक काबू करने में कामयाब रहे हैं. लेकिन आज एक ऐसी स्थिति है जहां भारत और दुनिया के कई देश काफी हद तक कोविड के साथ जीना सीख रहे हैं. यह अभी भी एक समस्या है, लेकिन अब उनका जीवन सामान्य हो गया है जबकि चीन को अपनी तथाकथित जीरो-कोविड पॉलिसी से बाहर निकलना मुश्किल हो रहा है. यह चीन को बहुत ज्यादा असंतोष और बहुत सारी समस्याओं की ओर ले जा रहा है.अब सोचिए कि शी जिनपिंग के लिए राजनीतिक दबाव क्या होंगे, खासकर उनके हाल के असीमित कार्यकाल के बाद.

चीन के कुछ वर्गों में वैक्सीनेशन अपेक्षाकृत कम

चीन की जीरो-कोविड पॉलिसी, हालांकि इसने चीन में कोविड को रोकने में मदद की, यह सुनिश्चित किया कि चीन में मौतों की संख्या अपेक्षाकृत कम हो, लेकिन इसने वहां बहुत असंतोष पैदा किया है. तीन साल से लोगों को कड़े लॉकडाउन और बार-बार परीक्षण और तमाम तरह के उपायों का सामना करना पड़ रहा है जिससे लोगों में निराशा है. जो अब वहां के लोगों के विरोध प्रदर्शनों के तौर पर नजर आ रही है.

26-27 नवंबर वाले वीकेंड में चीन के लगभग 20 शहरों में इसके खिलाफ व्यापक प्रदर्शन हुआ. यह एक गंभीर मामला है. क्योंकि सामान्य प्रदर्शनों के विपरीत जो स्थानीय अधिकारियों के खिलाफ निर्देशित होते हैं, इस बार शी जिनपिंग और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की व्यक्तिगत रूप से आलोचना की गई थी.

चीन में सर्विलांस स्टेट बहुत मजबूत है, उसने हस्तक्षेप किया है. दूसरे वे कुछ हद तक जीरो कोविड पॉलिसी की भी जांच कर रहे हैं.

साल 2020 में कोविड के पहले साल में चीन दुनिया की एकमात्र प्रमुख अर्थव्यवस्था थी जिसकी GDP के विस्तार के मामले में सकारात्मक विकास दर थी. लेकिन फिर लगातार लॉकडाउन और अन्य कड़े उपायों के चलते इसने चीनी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करना शुरू कर दिया. इस साल चीनी अर्थव्यवस्था आंशिक रूप से जीरो-कोविड पॉलिसी की वजह से 5.5 प्रतिशत के आधिकारिक लक्ष्य की तुलना में 3 प्रतिशत की दर से बढ़ेगी या उससे भी कम.

अब यह चीनी अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित कर रहा है. चीन ग्लोबल वैल्यू चेन (वैश्विक मूल्य श्रृंखला) का एक अहम हिस्सा है. तो इसका मतलब है कि यह ग्लोबल इकोनॉमी (वैश्विक अर्थव्यवस्था) को भी प्रभावित कर रहा है. आपको एक उदाहरण से समझाने के लिए पिछले महीने चीन के चेंगदू में iPhone की फैक्ट्री में प्रदर्शन हुए थे. फॉक्सकॉन के वर्कर इसमें बड़ी संख्या में शामिल हुए. इसने चीन की इकोनॉमी और ग्लोबल वैल्यू चेन (वैश्विक मूल्य श्रृंखला) दोनों के लिए मुश्किल हालात पैदा कर दिए.

हालात ऐसे हो गए कि चीन में भारी निवेश करने वाली कई कंपनियां अब चीन का विकल्प तलाश रही हैं. हालांकि यह आसान नहीं होगा क्योंकि चीन वैश्विक अर्थव्यवस्था का इतना बड़ा हिस्सा है, इसे दुनिया की फैक्ट्री कहा जाता है. चीनी बाजार से बाहर निकलना उनके लिए आसान नहीं होगा, लेकिन कंपनियां उस दिशा में सोच रही हैं. वह चीन के साथ रहकर कोई दूसरे विकल्प भी तलाश कर रही हैं जिससे चीन पर उनकी निर्भरता कम की जा सके.

चीन अपना दृष्टिकोण अपना रहा है, जो बाकी दुनिया से अलग है. लेकिन अब चीन एक गंभीर संकट का सामना कर रहा है. गिरती हुई अर्थव्यवस्था को देखते हुए पॉलिसी को जारी रखना ज्यादा से ज्यादा मुश्किल होता जा रहा है.

कोविड से निपटने में उनका कम्युनिस्ट सिस्टम पश्चिमी मॉडल या भारत जैसे देशों द्वारा अपनाए जा रहे लोकतांत्रिक मॉडल से ज्यादा श्रेष्ठ है इसके उदाहरण के तौर पर पेश किया था. यदि वे जीरो कोविड पॉलिसी से बाहर निकलते हैं, तो बड़ी संख्या में मौतें और अस्पताल में भर्ती होंगी क्योंकि वायरस के प्रति उनकी प्रतिरोधक क्षमता बहुत कम है. चीन में लोगों में हर्ड इम्युनिटी नहीं है.

वहां समाज के कुछ कमजोर वर्गों के बीच टीकाकरण का स्तर अपेक्षाकृत कम है. उदाहरण के लिए 80 और उससे अधिक उम्र के केवल 40 प्रतिशत लोगों को बूस्टर डोज सहित तीन खुराकें दी गई हैं. तो इससे भी गंभीर स्वास्थ्य संकट पैदा होगा.चीन को चिंता है कि अगर वह जीरो कोविड पॉलिसी से बाहर निकला तो उसके हेल्थ सिस्टम पर बहुत बुरा असर पड़ेगा. वे बड़ी संख्या में अस्पताल में भर्ती होने के हालात से निपटने में सक्षम नहीं होंगे. इसलिए इन सभी वजहों को देखते हुए मुझे उम्मीद है. इस खबर को अंग्रेजी मे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

(देखें पूरा इंटरव्यू https://www.news9plus.com/all पर)

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(कैरियर राजनयिक अशोक के कांता चीन में भारत के पूर्व राजदूत रह चुके हैं)

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