In Shraddha murder case polygraph and narco test only hope of police how correct to depend on them | श्रद्धा मर्डर केस में पॉलीग्राफ-नार्को टेस्ट पर टिकी उम्मीद, इन पर निर्भर रहना कितना सही?

नार्को टेस्ट के दौरान आरोपी को सोडियम पेंटोथॉल का इंजेक्शन दिया जाता है. इससे दिमाग कुछ बेहोशी की हालत में चला जाता है, लेकिन अगर डोज ऊपर नीचे हो गया तो आरोपी ज्यादा बेहोशी की हालत में पहुंच जाता है.

देश की राजधानी दिल्ली में हुए श्रद्धा मर्डर केस में सबूत ढ़ूंढ़ने की तैयारी जोरों पर चल रही है. 10 दिन से ज्यादा समय की रिमांड के बावजूद आरोपी आफताब अमीन पूनावाला के खिलाफ पुलिस सबूत जुटाने के लिए लगातार हाथ पैर मार रही है. पुलिस की जांच में आरोपी आफताब लगातार अपना बयान बदलकर पुलिस को गुमराह कर रहा है. ऐसे में अब पुलिस की उम्मीद पॉलीग्राफ और नार्को टेस्ट पर जाकर टिक गई है. आज यानि गुरुवार को आफताब का पॉलीग्राफ टेस्ट हो भी रहा है, लेकिन पुलिस के लिए नार्को और पॉलीग्राफ टेस्ट की मदद से केस को सुलझाना संभव हो सकेगा? पुलिस के सामने अन्य सबूतों को भी तलाशना बेहद जरूरी हो गया है जो हत्या के आरोपी के खिलाफ गुनाह को साबित कर सकें.

इन दो हत्याकांड से जानें कि कितने फायदेमंद हो सकते हैं ये दोनों टेस्ट

ये जानने के लिए पहले हमें कुछ पुराने केस और इन टेस्ट के नतीजों पर नजर डालनी होगी. 2008 में हुए आरुषी हत्याकांड की बात करते हैं. इस मर्डर केस में 14 साल की लड़की आरुषी की हत्या हो गई थी. इस मामले में आरुषी के पिता ने नौकर हेमराज पर हत्या का केस दर्ज कराया था, लेकिन इसी दौरान पुलिस को घर से हेमराज का भी शव मिला. इसके बाद पुलिस ने शक के आधार पर आरुषी के माता-पिता को भी गिरफ्तार कर लिया था. लेकिन इनके खिलाफ कोई सबूत न मिलने से तलवार दंपत्ती को बरी कर दिया गया था.

इसके बाद साल 2010 में कई लोगों का नार्को टेस्ट किया गया था. नार्को टेस्ट के बाद हत्या से जुड़ी कई जानकारियां तो मिली थीं, लेकिन पर्याप्त सबूतों का अभाव ही रहा. इस वजह से इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 12 अक्टूबर 2017 में उम्र कैद की सजा काट रहे तलवार दंपति को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था.

साल 2005 में भी व्यापारी अरुण कुमार टिक्कू की हत्या कर दी गई थी. इस हत्या का आरोप विजय पलांदे पर लगा था, लेकिन पुलिस जांच में कोई खास सबूत हाथ नहीं लगने की वजह से पुलिस को नार्को टेस्ट का सहारा लेना पड़ा था. नार्को टेस्ट में कई बातों का खुलासा हुआ और पुलिस जान सकी कि अरुण की हत्या कब और कैसे की गई थी. जाहिर है विजय पलांदे इस केस में उम्रकैद की सजा काट रहा है.

कितने फायदेमंद हैं नार्को और पॉलीग्राफ टेस्ट

वरिष्ठ मनोरोग विशेषज्ञ डॉ श्रीनिवास टी राजकुमार कहते हैं कि पॉलीग्राफ या फिर नार्को टेस्ट पर पूरी तरह निर्भर होना ठीक नहीं है. ये टेस्ट 100 फीसदी कारगर नहीं है. इस केस में पुलिस को फारेंसिक जांच और अभी तक मिले सबूतों पर ज्यादा ध्यान देना होगा. दरअसल पॉलीग्राफ टेस्ट या फिर नार्को में सारा सच सामने आने की कोई गारंटी नहीं होती है. ऐसा इसलिए क्योंकि पॉलीग्रफ टेस्ट के दौरान आरोपी की दिल की धड़कन, बीपी या फिर सांस लेने की दर से यह आकलन किया जाता है कि वह सच बोल रहा है या झूठ, लेकिन अगर कोई आरोपी शातिर है तो वह इस टेस्ट के दौरान काफी नॉर्मल रहते हुए भी सवालों का जवाब दे सकता है. इस दौरान न तो उसका बीपी बढ़ता है और न ही हार्ट रेट. जाहिर है ऐसा शातिर अपराधियों का पॉलीग्राफ टेस्ट के दौरान मशीन में दिख रहे ग्राफ में कोई खास उतार-चढ़ाव नहीं दिखाई पड़ता है. इसलिए इस टेस्ट से बहुत फायदा मिले ऐसा हमेशा जरूरी नहीं होता है.

क्या नार्को टेस्ट से अपराध को किया जा सकता है साबित

डॉ राजकुमार कहते हैं कि नार्को टेस्ट के दौरान आरोपी को सोडियम पेंटोथॉल का इंजेक्शन दिया जाता है. इससे दिमाग कुछ बेहोशी की हालत में चला जाता है, लेकिन अगर डोज ऊपर नीचे हो गया तो आरोपी ज्यादा बेहोशी की हालत में पहुंच जाता है. ऐसे में वो सिर्फ सवालों का जवाब हां या ना में ही दे पाता है. इससे पुलिस और टेस्ट के दौरान मौजूद अन्य अधिकारियों को सभी जानकारी नहीं मिल पाती हैं. इसलिए ये कह सकते हैं कि नार्को या फिर पॉलीग्राफ किसी भी जांच में रामबाण नहीं हैं. ये टेस्ट केवल सहायक टूल ही साबित होता है. इसलिए इन टेस्ट की मदद से अपराधी का अपराध साबित करना कई बार मुश्किल हो जाता है.

फॉरेंसिक जांच सबूत का मुख्य आधार

डॉ राजकुमार कहते हैं कि श्रद्धा मर्डर केस में फॉरेंसिक जांच के जरिए सबूत जुटाना ज्यादा महत्वपूर्ण है. जंगलों से मिली हड्डियों के मार्फत डीएनए जांच कर केस को क्रैक करना ज्यादा कारगर साबित हो सकता है. डॉ राजकुमार के मुताबिक डीएनए रिपोर्ट का जल्दी आना बेहतर परिणाम दे सकता है. हड्डियां अगर श्रद्धा की मिल जाती हैं तो केस आईने की तरह साफ हो जाएगा, लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ तो फिर से जांच करने को कहा जा सकता है. ऐसे में यह महत्वपूर्ण है कि पॉलीग्राफ या नार्को टेस्ट के दौरान आरोपी आफताब क्या कबूल करता है. इस टेस्ट की सफलता पर केस टिका हुआ जरूर है, लेकिन ऐसा नहीं कहा जा सकता कि इन टेस्ट के जरिए ही केस पूरी तरह से सुलझ जाएगा.

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