Fog can be very useful in water scarcity, know what is fog harvesting | सूखे से बचा सकता है कोहरा, इसे कोसने से पहले ये जान लीजिए

दक्षिण अफ्रीका सूखे की मार झेल रहा है, यहां पानी की सबसे ज्यादा कमी है, इसीलिए फॉग हार्वेस्टिंग की शुरुआत सबसे पहले अफ्रीका में ही हुई. तकरीबन 52 साल पहले इस तकनीक का प्रयोग किया गया था.

सूखे से बचा सकता है कोहरा, इसे कोसने से पहले ये जान लीजिए

कोहरा आफत नहीं राहत भी है..

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कोहरे की चादर ने उत्तर भारत में पांव पसारने शुरू कर दिए हैं, दिल्ली-एनसीआर घने कोहरे की चपेट में आ चुका है. सड़कों पर वाहनों के आवागमन से लेकर पैदल चलने वालों को भी परेशानी हो रही है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस कोहरे को आप यूं कोस रहे हैं वह कई देशों के लिए कुदरत का वरदान है. ये देश अपने यहां बाकायदा कोहरे की ‘खेती’ करते हैं. इससे एक दिन में एक स्थान पर 1 हजार लीटर तक पानी पाया जा सकता है. इस तकनीक को फॉग हार्वेस्टिंग कहते हैं. ये रेन वाटर हार्वेस्टिंग की तरह की ही तकनीक है.

क्यों जरूरी है कोहरा

कोहरा क्यों जरूरी है ये जानने से पहले समझना होगा कि कोहरा बनता कैसे है. दरअसल ठंड के मौसम में हवा में मौजूद नमी बूंद में बदल जाती है. जो हमें कोहरे के तौर पर नजर आती है. जब इसमें धुएं का मिश्रण हो जाता है तो ये स्मॉग बन जाता है. बात कोहरे की करें तो हवा की नमी जो बूंदों में बदल जाती है, उसे ही फॉग हार्वेस्टिंग की मदद से पानी में बदला जाता है, इस पानी को दैनिक जरूरतों में इस्तेमाल किया जा सकता है.

कैसे होती है फॉग हार्वेस्टिंग

हवा में मौजूद नमी को बूंदों में बदलने के बाद इसे कैप्चर करने की जरूरत होती है, इसके लिए बड़े-बड़े जाल लगाए जाते हैं, इनसे टकराकर फॉग बूंदों में बदलता है और पाइप के सहारे इस पानी को टैंक में इकट्ठा कर लिया जाता है, जिसे समय आने पर प्रयोग किया जाता है. खासकर पहाड़ी और समुद्री इलाकों में यह तकनीक ज्यादा कारगर है, क्योंकि वहां कोहरा जयादा होता है. विशेषज्ञों के मुताबिक इस तकनीक से एक दिन में किसी एक स्थान पर 1 हजार लीटर पानी इकट्ठा किया जा सकता है, हालांकि ये जाल के साइज, स्थान और कोहरे पर निर्भर करता है.

52 साल पहले दक्षिण अफ्रीका में शुरू हुई थी तकनीक

दक्षिण अफ्रीका सूखे की मार झेल रहा है, यहां पानी की सबसे ज्यादा कमी है, इसीलिए फॉग हार्वेस्टिंग की शुरुआत सबसे पहले अफ्रीका में ही हुई. तकरीबन 52 साल पहले यहां सबसे पहले सौ वर्ग मीटर में दो डिवाइस लगाए गए थे जो कोहरे को कैच करके पाइप की मदद से एक कंटेनर में ले जाते थे. हालांकि उस समय सिर्फ 14 लीटर ही पानी जमा हो सकता था, लेकिन तकनीक सफल रही थी. तब से केपटाउन में इस तकनीक का प्रयोग किया जा रहा है.

नेपाल में कोहरे से पानी लेने के सात प्रोजेक्ट

साउथ अफ्रीका ही नहीं अपने पड़ोसी देश नेपाल में भी कोहरे से पानी की सप्लाई होती है. 1997 में एक कनाडाई फिल्ममेकर केविन ने द नेपाल वाटर फ्रॉम फॉग प्रोजेक्ट (NWFP) को इसका सुझाव दिया था. वमर्तमान में तापेजिलिंग, टिनिज्यूत, डांडा बाजार, कलपोखती, मेग्मा, टम्ब्लिंग और प्रथ्वीवरा मंदिर पर ये प्रोजेक्ट चल रहा है. इसमें सबसे सफल प्रथ्वीवरा मंदिर का प्रोजेक्ट हैं यहां प्रतिदिन 500 लीटर पानी की सप्लाई की जा रही है. इससे पहले कनाडा और इटली में भी इस तरह का प्रयोग हो चुका है.

मंडी आईआईटी में हुआ शोध

भारत में हिमाचल प्रदेश में स्थित आईआईटी के शोधकर्ताओं ने कोहरे से पानी बनाने वाला एक पॉलिमर मैटेरियल विकसित किया है. इस पॉलिमर को ड्रैगन्स लिली हेड की पत्तियों के पैटर्न पर बनाया गया है. अपनी खास बनावट के चलते से कोहरे की नमी को एकत्रित कर लेती हैं. यह शोध आईआईटी मंडी के वैज्ञानिक डॉ. वेंकट कृष्णन के निर्देशन में किया गया है. इंडिया साइंस वायर की एक रिपोर्ट के मुताबिक इस सजावटी पौधे की पत्तियों की तर्ज पर कोहरे से पानी बनाया जा सकता है.

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