Bye Election How Hemwati Nandan Bahuguna wins elections against Indira Gandhi | वो उपचुनाव जिसकी तीन तारीखें बदलीं, इंदिरा गांधी ने कीं 34 सभाएं फिर भी विपक्षी बहुगुणा जीते

कांग्रेस इस चुनाव में हर कीमत पर बहुगुणा जी की हार चाहती थी. इसे स्वीकार किया था , उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय के साथ अपने साक्षात्कार में.

वो उपचुनाव जिसकी तीन तारीखें बदलीं, इंदिरा गांधी ने कीं 34 सभाएं फिर भी विपक्षी बहुगुणा जीते

हेमवती नंदन बहुगुणा को परास्त करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कमान संभाली थी.

उपचुनाव राज्य की विधानसभा के हों या फिर लोकसभा के. नतीजे भले सरकार की सेहत पर असर न डालें. लेकिन विपक्ष उन्हें सत्ता दल को आईना दिखाने के लिए जीतना चाहता है, तो सत्ता दल जनसमर्थन के बरकरार रहने का सबूत देने के लिए. 5 दिसंबर को होने वाले उत्तर प्रदेश की मैनपुरी लोकसभा सीट और रामपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव सपा और सत्तादल भाजपा की नाक के सवाल बने हुए हैं.

इस बीच एक ऐसे उपचुनाव को याद करते हैं, जिसने इतिहास रच दिया. उस उपचुनाव में विपक्षी दिग्गज हेमवती नंदन बहुगुणा को परास्त करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कमान संभाली थी. उत्तर प्रदेश सहित कांग्रेस शासित पांच राज्यों के मुख्यमंत्रियों और तमाम मंत्रियों ने क्षेत्र में डेरा डाला और सरकारी संसाधन झोंक दिए. फिर एक बार मतगणना के पहले चुनाव आयोग ने पूरा चुनाव निरस्त कर दिया. इस चुनाव की तीन बार तारीखें बदली गईं. लेकिन सत्ता दल की तमाम कोशिशों के बाद भी विपक्षी बहुगुणा जी भारी पड़े थे.

कांग्रेस के साथ लोकसभा की सदस्यता से भी त्यागपत्र

हेमवती नंदन बहुगुणा की कांग्रेस में दूसरी पारी काफी संक्षिप्त थी. जनता पार्टी और फिर चरण सिंह सरकार के पतन के बाद बहुगुणा जी की घर वापसी के लिए इंदिरा गांधी ने पहल की थी. उन्हें कांग्रेस का सेक्रेटरी जनरल बनाया गया लेकिन 1980 में इंदिरा जी की सत्ता में वापसी के चंद दिनों के भीतर ही बहुगुणा जी हाशिए पर डाल दिए गए. इस बीच बहुगुणा जी पत्रों के जरिए इंदिरा जी का ध्यान विभिन्न मुद्दों की ओर आकृष्ट करते रहे.

कांग्रेस में रहते 10 मई 1980 के उनके आखिरी पत्र का इंदिरा जी ने 19 मई को छह पेज में जबाब दिया. बहुगुणा जी ने उसी दिन कांग्रेस और लोकसभा की सदस्यता से त्यागपत्र दे दिया. बहुगुणा के इस कदम ने हलचल मचा दी थी. लोकसभा की सदस्यता के त्याग ने उनके कद को काफी बड़ा बना दिया.

पहला चुनाव जिसे मतगणना के पहले रद्द किया गया

कांग्रेस छोड़ने के बाद बहुगुणा जी ने फिर से गढ़वाल से चुनाव लडने का फैसला किया. मुख्य चुनाव आयुक्त ने 26 मई 1981 को गढ़वाल की रिक्त सीट भरे जाने की आधिसूचना जारी की. 14 जून को मतदान और 18 जून को चुनाव परिणाम की घोषणा की जानी थी. कांग्रेस के चंद्र मोहन सिंह नेगी सहित पांच प्रत्याशी मैदान में थे. मतदान में जमकर धांधली हुई. भारत के चुनावी इतिहास का यह पहला चुनाव था, जब मतगणना के पहले एक उच्च स्तरीय जांच के निष्कर्षों के आधार पर चुनाव आयोग ने चुनाव को रद्द करके पुनः चुनाव कराने का फैसला किया.

आयोग ने चुनाव की दूसरी तारीख 30 सितंबर 1981 निश्चित की. कांग्रेस प्रत्याशी के प्रतिवेदन पर आयोग ने मतदान की तिथि बदलकर 22 नवंबर निर्धारित की. तकनीकी आधार एक बार फिर चुनाव में बाधक बने. अंतिम बार मतदान की तिथि 19 मई 1982 निश्चित की गई. 22 मई को मतगणना और अगले दिन परिणाम घोषणा की तारीख तय की गई.

इंदिरा जी ने उपचुनाव को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ा

इस चुनाव के नतीजे का केंद्र की सरकार की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ना था , लेकिन यह कितना अहम था, इसे पहली बार मतगणना के पहले रद्द किए जाने और फिर बार-बार टाले जाने से समझा जा सकता है. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा जी ने इस उपचुनाव को सीधे अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ लिया था. उन्होंने इस संसदीय क्षेत्र के उपचुनाव में 34 जनसभाएं की थीं. उत्तर प्रदेश, हरियाणा , पंजाब, मध्य प्रदेश, हिमाचल आदि राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ ही 62 मंत्रियों ने वहां डेरा डाल दिया था.

मतदान के दिन मतदान केंद्रों की देखभाल के लिए 43 मंत्री तैनात थे. संगठन से जुड़े बाहर से आए पार्टी नेताओं , कार्यकर्ताओं और साथ लगे चौपहिया वाहनों की गिनती नहीं थी. इस एक क्षेत्र में कांग्रेस ने अपने नेताओं को प्रचार के लिए 11 हेलीकॉप्टर उपलब्ध कराए थे. दिलचस्प है कि शिकायतों की जांच के लिए सरकार से आयोग की एक हेलीकॉप्टर की मांग अनसुनी रही. उत्तर प्रदेश पुलिस को पर्याप्त नहीं माना गया. केंद्रीय बलों के अलावा हरियाणा और पंजाब की पुलिस लगाई गई. 14 जून को पहली बार मतदान के मौके पर सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार गढ़वाल संसदीय क्षेत्र में 15,675 पुलिस के जवान मौजूद थे.

हर कीमत पर बहुगुणा की हार चाहती थी कांग्रेस

कांग्रेस इस चुनाव में हर कीमत पर बहुगुणा जी की हार चाहती थी. इसे स्वीकार किया था , उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय के साथ उनकी किताब ” मंजिल से ज्यादा सफर ” में अपने साक्षात्कार में.

सिंह के अनुसार ,” कांग्रेस पार्टी ने इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था कि किसी भी कीमत पर बहुगुणा जीतने न पाएं. किंतु साफ दिख रहा था कि बहुगुणा जीत रहे हैं. चुनाव हुए और एक योजना के तहत चुनाव आयोग को तमाम रिपोर्टें भिजवाई गई. आयोग पर दबाव डाले गए. फिर चुनाव निरस्त हो गया. मुख्यमंत्री के नाते मैंने भी उसमें सक्रिय भूमिका निभाई. उक्त निर्णय को कार्यरूप देने की मेरी जिम्मेदारी थी. ”

लाइन लगवाकर लाठियां बंटवा रहे थे भजनलाल

विश्वनाथ प्रताप सिंह ने आगे बताया था, “हिमाचल और हरियाणा के मुख्यमंत्री भजनलाल हम लोगों के साथ प्रचार कर रहे थे. भजनलाल अपने साथ बड़ी संख्या में कार्यकर्ता साथ लाए थे. भजनलाल के कहने पर वे कार्यकर्ता बाजार में जाकर लाठियां और बांस खरीदने लगे. क्षेत्र में अफवाह फैली कि मतदाताओं को डराने-धमकाने और बूथ पर कब्जे के लिए लाठियां खरीदी जा रही हैं. तभी मैं वहां पहुंचा था तो देखा कि भजनलाल हरियाणा से आए वर्करों की लाइन लगवाकर लाठियां बंटवा रहे थे. मैं समझ गया था कि सारा मामला बिगड़ जाएगा. वहां के लोगों में इसकी तीव्र प्रतिक्रिया हुई थी और जब उन्होंने पहाड़ से उन पर पत्थर मारने शुरू किए तो ये लोग जान बचाकर भाग लिए.”

जनमत के आगे हर सत्ता बौनी

अगर ये उपचुनाव सता के बेजा और शर्मनाक इस्तेमाल के लिए याद किया जाता है तो इस बात के लिए भी कि अगर जनता जागरूक और साथ हो तो उसके आगे हर सत्ता बौनी साबित होती है. मतगणना से पहले सरकारी दबाव में चुनाव रद्द करने और मतदान की तारीखें बार बार टालने के बाद भी बहुगुणा जी ने 29,024 मतों के अंतर से यह चुनाव जीत लिया था. विश्वनाह प्रताप सिंह के अनुसार, “वे उसी क्षेत्र के थे. यद्यपि उन्होंने इलाहाबाद को अपनी कर्मभूमि बना लिया था. लेकिन उस समय वे पहाड़ पर व्यवस्था विरोधी नेता के तौर पर लोकप्रिय हो गए थे. कांग्रेस के चुनाव अभियान की जबरदस्त प्रतिक्रिया का भी उन्हें लाभ मिला. जनता यह पसंद नहीं करती कि बाहरी लोग उनके इलाके में लाठी लेकर घूम-घूम कर बूथ पर कब्जा करें.”

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