Bharat Jodo Yatra Rajasthan Political Crisis Ashok Gehlot Strictly Says No To Sachin Pilot Now Mallikarjun Kharge To Take Action | ‘पायलट के अलावा कोई भी’ आलाकमान को गहलोत की इस नई चुनौती का क्या असर होगा

यात्रा से एक हफ्ते पहले अशोक गहलोत ने अपने कट्टर विरोधी सचिन पायलट के खिलाफ इस्तेमाल किए गए “गद्दार” तंज को दोहराते हुए एक तूफान खड़ा कर दिया है.

'पायलट के अलावा कोई भी' आलाकमान को गहलोत की इस नई चुनौती का क्या असर होगा

सचिन पायलट, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी

Image Credit source: @msgpahujaa

3 दिसंबर को भारत जोड़ो यात्रा के राजस्थान चरण में राहुल गांधी को एक राजनीतिक तूफान का सामना करना पड़ सकता है, जबकि 5 सितंबर से पांच राज्यों से गुजरे अपने पैदल मार्च के दौरान उन्हें अब तक लोगों का काफी समर्थन देखने को मिला है. यात्रा से एक हफ्ते पहले अशोक गहलोत ने अपने कट्टर विरोधी सचिन पायलट के खिलाफ इस्तेमाल किए गए “गद्दार” तंज को दोहराते हुए एक तूफान खड़ा कर दिया है.

गहलोत ने कांग्रेस आलाकमान को यह कहते हुए चुनौती दी है कि वे उन्हें “ऐसे किसी गद्दार के साथ रिप्लेस नहीं किया जा सकता है जिसने पार्टी को धोखा दिया और जिसके समर्थन में 10 विधायक भी नहीं हैं.” एक चैनल को दिए इंटरव्यू में मुख्यमंत्री ने कोई नया खुलासा नहीं किया है. उन्होंने पहले भी पायलट पर कांग्रेस सरकार गिराने के लिए बीजेपी नेताओं से पैसे लेने का आरोप लगाया है. इतना ही नहीं, इस बार गहलोत ने आलाकमान को परोक्ष रूप से यह चुनौती दी है कि वह उनके प्रतिद्वंद्वी को सीएम पद का चेहरा बनाकर तो दिखाए.

हालांकि, मुख्यमंत्री को विधायकों के भारी समर्थन के डर से आलाकमान ने अब तक इस बारे में कुछ नहीं किया है. एक महीने पहले हुए कांग्रेस में सत्ता परिवर्तन ने राजस्थान में नेतृत्व पर गतिरोध को तोड़ने के लिए बहुत कम काम किया है. इस निष्क्रियता के कारण अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव अजय माकन को उनके राजस्थान प्रभार से इस्तीफा देना पड़ा.

राजस्थान में कट्टर प्रतिद्वंद्वियों के बीच जारी लड़ाई का ताजा दौर एक मजबूत संकेत है कि गहलोत ने “करो या मरो” के लिए अपना मन बना लिया है, भले ही सचिन पायलट आलाकमान पर मुख्यमंत्री के रूप में उनका नाम आगे करने का दबाव बढ़ा रहे हों, लेकिन गहलोत का कहना है कि पायलट के अलावा कांग्रेस का कोई और विधायक उन्हें उत्तराधिकारी के रूप में स्वीकार्य है. अगर शीर्ष नेतृत्व को लगता है कि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी की स्थिति बेहतर होगी तो कांग्रेस पायलट को छोड़कर अपने 102 विधायकों में से किसी को भी चुन सकती है.’

उनका विश्वास सितंबर में हुए शक्ति प्रदर्शन से उपजा था जब 90 से अधिक विधायकों ने दृढ़ता से उनका पक्ष लिया था. जब उन्हें लगा कि सचिन पायलट को सीएम बनाया जा सकता है तो उन्होंने कांग्रेस विधायक दल की बैठक का बायकॉट कर दिया और अपना इस्तीफा सौंप दिया था. इस विद्रोह को दबाने के लिए हाईकमान ने कांग्रेस के दो पर्यवेक्षकों को राजस्थान भेजा था. जिन्होंने पाया था कि इस विद्रोह के पीछे तीन विधायक जिम्मेदार हैं और उनकी गंभीर अनुशासनहीनता के खिलाफ कार्रवाई करने की सिफारिश की थी.

रिपोर्ट तैयार करने वाले पर्यवेक्षकों में से एक मल्लिकार्जुन खरगे थे, जो अब पार्टी अध्यक्ष हैं. दूसरे अजय माकन थे, जिन्होंने राजस्थान के प्रभारी के रूप में इस्तीफा दे दिया है. जहां तक तीन बागी विधायकों का संबंध है वे अपने पद का बेधड़क आनंद ले रहे हैं.

बदले हुए राजनीतिक समीकरण

यह पहली बार नहीं है जब अशोक गहलोत ने सचिन पायलट को ‘गद्दार’ कहा हो. जुलाई 2020 में राजस्थान में मुख्यमंत्री को हटाने के लिए अपने वफादार विधायकों के असफल विद्रोह का नेतृत्व करने के बाद से पायलट को कई बार गहलोत का शिकार बनना पड़ा है. लेकिन तब से अब तक राजनीतिक समीकरण बदल गए हैं. असफल विद्रोह के दौरान गहलोत गांधी परिवार के प्रिय थे और पायलट खलनायक. लेकिन धीरे-धीरे पायलट गांधी भाई-बहनों, खासकर प्रियंका के खास हो गए. दूसरी ओर, गहलोत की किसी भी कीमत पर मुख्यमंत्री बने रहने की प्रबल महत्वाकांक्षा ने गांधी परिवार को चिढ़ा दिया. राहुल और प्रियंका ने एक साल पहले गहलोत को हटाने पर विचार किया था और समय-समय पर उन्होंने अपने इरादे के बारे में संकेत दिया था.

गहलोत की ताकत बनाम हाईकमान

लेकिन उनकी योजना में सबसे बड़ी बाधा गहलोत द्वारा ज्यादातर विधायकों को अपने पाले में रखने की चतुराई है. इस बात को ध्यान में रखते हुए कि आलाकमान की हुकूमत अब पहले की तरह नहीं चलती, गांधी भाई-बहनों ने एक अड़ियल गहलोत को पार्टी की अध्यक्षता देने की योजना बनाई. लेकिन गहलोत ने शर्त रख दी कि वह अध्यक्ष पद संभालने के लिए तैयार हैं बशर्ते वह मुख्यमंत्री भी बने रहेंगे.

गहलोत की हठधर्मिता ने गांधी परिवार की योजना को विफल कर दिया. प्लान बी को अमल में लाया गया और अस्सी साल के खरगे को अध्यक्ष की दौड़ में शामिल किया गया. शशि थरूर द्वारा मिली एक कमजोर चुनौती के सामने खड़गे का चुनाव एक पूर्व निर्धारित परिणाम था. लेकिन राजस्थान का संकट सुलझने से कोसों दूर है. यह आलाकमान के लिए एक दर्दनाक समस्या बना हुआ है कि गहलोत इतने शक्तिशाली मुख्यमंत्री हैं कि उन्हें पद छोड़ने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता.

सितंबर में और गहरा हुआ संकट

संकट तभी गहरा गया जब मुख्यमंत्री के वफादार 90 से अधिक विधायकों ने सचिन पायलट द्वारा गहलोत का स्थान लेने की संभावना के विरोध में पार्टी की एक महत्वपूर्ण बैठक में भाग लेने से इनकार कर दिया. विद्रोह की इस खुली घटना ने आलाकमान को भी हक्का-बक्का कर दिया.

25 सितंबर के संकट की अपनी रिपोर्ट में माकन ने विशेष रूप से तीन विधायकों-महेश जोशी, धर्मेंद्र राठौड़ और शांति धारीवाल के खिलाफ कार्रवाई की मांग की थी, जिन्होंने एक प्रस्ताव पारित करने के लिए विधायकों की एक समानांतर बैठक की मेजबानी की थी कि वे केवल गहलोत को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकार करेंगे.

पायलट ने भी कमर कसी

जयपुर हादसे पर एआईसीसी के पर्यवेक्षकों की रिपोर्ट आलाकमान पर कार्रवाई के लिए दबाव बनाने के लिए सचिन पायलट के काम आई है. उनका अनुमान है कि गहलोत गंभीर अनुशासनहीनता के दोषी पाए गए तीन वफादारों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई को बर्दाश्त नहीं करेंगे. वह इस संभावना पर भरोसा कर रहे हैं कि मुख्यमंत्री आलाकमान की अवहेलना करें और उनकी स्थिति को मजबूती मिले. लेकिन, आलाकमान का साथ उन्हें नहीं मिल रहा.

खरगे की दुविधा

नवनिर्वाचित कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे उस रिपोर्ट को नजरअंदाज करने का जोखिम नहीं उठा सकते हैं, जिसके वह भी हस्ताक्षरकर्ता थे, लेकिन न ही वह इस संभावना से मुंह मोड़ सकते हैं कि गहलोत को नाराज करने से सरकार का पतन हो सकता है. विधानसभा चुनाव से एक साल पहले इस तरह के हालात से उस राज्य में आपदा ही आएगी जहां कांग्रेस पहले से ही मतदाताओं के बीच सत्ता विरोधी लहर का सामना कर रही है.

8 नवंबर को पायलट ने आलाकमान को अपनी विश्वसनीयता स्थापित करने के लिए तेजी से कार्य करने की धमकी दी थी. लेकिन खड़गे ने अभी तक कुछ नहीं किया है. न ही अजय माकन के इस्तीफे ने आलाकमान को बागियों के खिलाफ कुछ एक्शन लेने पर प्रेरित किया.

गहलोत की चाल

गुरुवार को एक इंटरव्यू में सचिन पायलट के खिलाफ मुख्यमंत्री की नाराजगी वास्तव में आलाकमान की लाचारी का प्रमाण है. उन्होंने राजस्थान में भारत जोड़ो यात्रा के प्रवेश से पहले आलाकमान की किसी भी कार्रवाई को रोकने के लिए पायलट के खिलाफ अपने गुस्से का इजहार किया है. सचिन पायलट ने गहलोत पर पलटवार करते हुए कहा कि उन पर हमला करने और पूरी तरह से “झूठे और निराधार” आरोप लगाने के लिए इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करना उनके कद के अनुरूप नहीं है.

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शब्दों की ये जंग राजस्थान में सत्ताधारी पार्टी में व्यापक दरार का संकेत दे रही है. जहां अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. हालांकि, एआईसीसी ने डैमेज कंट्रोल करने के लिए कदम बढ़ाया है. जयराम रमेश ने कहा, “अशोक गहलोत एक वरिष्ठ और अनुभवी नेता हैं. उन्होंने अपने सहयोगी सचिन पायलट के साथ जो भी मतभेद व्यक्त किए हैं, उन्हें इस तरह से हल किया जाएगा जिससे कांग्रेस मजबूत हो.”

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