Ahmedabad Manoj Kukrani’s daughter Payal Kukrani is contesting from Naroda Assembly seat | नरोदा पाटिया : दंगों के जख्म के बीच बीजेपी कैंडिडेट पायल कुकरानी की राह कितनी आसान?

नरोदा सीट का जातीय गणित कुछ इस तरह है, यहां पर 62000 की तादाद में सिंधी मतदाता हैं, ओबीसी मतदाता 48000 हैं, दलित 20000, क्षत्रिय 10000, ब्राह्मण 10000 हैं. पढ़िए अजीत प्रताप सिंह की ये रिपोर्ट.

नरोदा पाटिया : दंगों के जख्म के बीच बीजेपी कैंडिडेट पायल कुकरानी की राह कितनी आसान?

गुजरात विधानसभा चुनाव

अहमदाबाद की नरोदा विधानसभा किसी जमाने में गांव हुआ करता था. 2002 में जब यहां दंगे हुए, तब यहां पर 97 लोगों ने जान गंवाई थी. उस समय यह इलाका शहर का उत्तरी कोना हुआ करता था, लेकिन अब ये शहर के बीच में है. आजकल चर्चाओं में इसलिए है, क्योंकि इस विधानसभा सीट से बीजेपी ने जिस उम्मीदवार को मैदान में उतारा है, वह उस समय के दंगे में शामिल मनोज कुकरानी की बेटी है.

नरोदा दंगा मामले में मनोज कुकरानी मुख्य अभियुक्त रहे हैं और कोर्ट ने इन्हें उम्र कैद की सजा भी सुनाई. लेकिन बीजेपी ने उनकी बेटी पायल कुकरानी को टिकट देकर एक नये विवाद को पैदा कर दिया है. वैसे तो पायल कुकरानी पेशे से डॉक्टर हैं लेकिन इनका खुद का कोई राजनीतिक अनुभव नहीं है. इस विधान सीट पर मुकाबला त्रिकोणीय है. एनसीपी की तरफ से यहां मेघराज मैदान में है, आम आदमी पार्टी की तरफ से ओमप्रकाश तिवारी चुनावी मैदान में हैं. इस सीट पर पिछले कई वर्षों से बीजेपी का कब्जा रहा है, लेकिन इस बार इस सीट पर जिस उम्मीदवार को पार्टी ने टिकट दिया है उसके चलते पार्टी की किरकिरी हो रही है.

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पायल कुकरानी

नरोदा सीट का क्या है चुनावी गणित?

नरोदा सीट का जातीय गणित कुछ इस तरह है, यहां पर 62000 की तादाद में सिंधी मतदाता हैं, ओबीसी मतदाता 48000 हैं, दलित 20000, क्षत्रिय 10000, ब्राह्मण 10000 हैं. लेकिन यहां पर दूसरे राज्य से आए हुए लोगों का वर्चस्व है. मगर सबसे ज्यादा मतदाता सिंधी समाज के हैं, इसलिए यहां पर बीजेपी हमेशा से सिंधी उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारती रही है.

2002 के दंगों में इस इलाके में 97 लोगों की मौत हुई. इनके परिवार भी इसी इलाके में रहते हैं, कुछ परिवार ऐसे हैं जो आज भी उस वक्त लगे जख्मों को भुला नहीं पा रहे हैं, कई परिवारों ने अपनों को खोया है और कई लोगों को इन दंगों ने ऐसे जख्म दिए हैं कि उन जख्मों को आज तक नहीं भरा जा सका है. कई परिवार ऐसे हैं जिनमें एक ही परिवार के कई लोग इन दंगों में मारे गए. इन परिवारों में उनके बच्चे अब अनाथ जिंदगी जी रहे हैं, कई महिलाएं विधवा की जिंदगी जी रही हैं और इसी इलाके में रह रही हैं.

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19 लोगों ने नरोदा कांड में अपनी जान गवाई थी

इस इलाके में रहने वाले दंगा पीड़ित सलीम शेख बताते हैं कि उन्होंने मनोज कुकरानी के खिलाफ गवाही दी थी क्योंकि उनके परिवार के 3 लोगों की इन दंगों में मौत हुई थी. इस इलाके में रहने वाली फातिमा शेख कहती है उनके परिवार के 19 लोगों ने नरोदा कांड में अपनी जान गवाई थी, वह जख्म अभी हरे हैं. दंगा पीड़ितों की मदद करने वाले वकील शमशाद पठान कहते हैं कहते हैं कि अब इंसाफ की उम्मीद धूमिल हो चुकी है.

पायल कुकरानी अकेले इस वजह से ही चर्चा में नहीं है. इस इलाके का सिंधी समाज भी इनका विरोध कर रहा है और इस समाज का विरोध करने की वजह पायल कुकरानी का अंतरजातीय विवाह करना है. क्योंकि कुछ लोग इसे स्वीकार नहीं कर रहे हैं हालांकि कुछ लोग ये भी मानते है की ये उनका निजी मामला है. इसी इलाके के सिंधी रमेश थोरानी कहते हैं की पूरे गुजरात में सिंधी समाज के लिए महज एक सीट थी, बह भी बीजेपी ने किसी और के नाम कर दी क्योंकि अंतरजातीय विवाह करने से वह पायल को अब सिंधी मानने को तैयार नहीं है.

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पायल कुकरानी से हमने एक धर्मशाला में बातचीत करने की कोशिश की पर वह गला खराब होने की बात कहकर बातचीत से बचती रही. वैसे तों कानून के जानकार कहते हैं की अपराधी का बेटा अपराधी नहीं होता, यह बात कानून के दायरे में 100 फ़ीसदी सच है. बीजेपी प्रवक्ता यमन व्यास कहते हैं की पार्टी ने किसी आरोपी को टिकट नहीं दिया है. पायल साफ छवि की है और वह एक बुद्धिमान डॉक्टर भी हैं. लेकिन इस आधार पर किसी को टिकट ना देना, नाइंसाफी है क्योंकि इस दंगे को हुए 22 साल गुजर चुके हैं और सब लोग भूल चुके हैं और अब हमें नई सोच के साथ आगे बढ़ना होगा.

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